Friday, 8 January 2016

अध्यापक : बच्चों रामचंद्र ने समुन्द्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया ।

अध्यापक : बच्चों रामचंद्र ने समुन्द्र पर पुल बनाने का निर्णय लिया ।
पप्पू : सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ ।
अध्यापक : कहो बेटा ।
पप्पू : रामचन्द्र का पुल बनाने का निर्णय गलत था ।
अध्यापक : कैसे ?
पप्पू : सर उनके पास हनुमान थे जो उड़कर लंका जा सकते थे । तो उनको पुल बनाने की कोई जरुरत ही नही थी ।
अध्यापक : हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकि रीछ और वानर तो नही उड़ते थे ।
पप्पू : सर वो हनुमान की पीठ पर बैठकर जा सकते थे । जब हनुमान पूरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे तो वानर सेना को भी तो उठाकर ले जा सकते थे ।
अध्यापक : भगवान की लीला पर सवाल नही उठाया करते ।
पप्पू : वैसे सर एक उपाय और था ।
अध्यापक : क्या ?
पप्पू : सर हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा बड़ा कर सकते थे जैसे सुरसा के मुँह से निकलने के लिए छोटे हो गए थे और सूर्य को मुँह में देते समय सूर्य से बड़े तो वो अपने आकार को भी तो समुन्द्र की चौड़ाई से बड़ा कर सकते थे और समुन्द्र के ऊपर लेट जाते । सारे बंदर हनुमान जी की पीठ से गुजरकर लंका पहुँच जाते और रामचंद्र को भी समुन्द्र की अनुनय विनय करने की जरुरत नही पड़ती । वैसे सर एक बात और पूछूँ ?
अध्यापक : पूछो ।
पप्पू : सर सुना है । समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर पर राम राम लिखा था जिससे पत्थर पानी पर तैरने लगे थे ।
अध्यापक : हाँ तो ये सही है ।
पप्पू :सवाल ये है बन्दर भालुओं को पढ़ना लिखना किसने सिखाया था ?
अध्यापक : हरामखोर बंद कर अपनी बकवास और मुर्गा बन जा ।..........

शादी मे (buffet) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में आता था जैसे....

शादी मे (buffet) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में आता था जैसे....

पहले जगह रोकना !

बिना फटे पत्तल दोनों का सिलेक्शन!

☝चप्पल जुते पर आधा ध्यान रखना...!

फिर पत्तल पे ग्लास रखकर उड़ने से रोकना!

नमक रखने वाले को जगह बताना यहां रख!

दाल सब्जी देने वाले को गाइड करना हिला के दे या तरी तरी देना!

उँगलियों के इशारे से 2 गुलाब जामुन लेना !

पूडी छाँट छाँट के गरम गरम लेना !.

पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ गया ! अपने इधर और क्या बाकी है।
जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना

पास वाले रीश्तेदार के पत्तल में जबरदस्ती पूडी रखवाना !

रायते वाले को दूर से आता देखकर फटाफट रायते का दोना पीना ।

 पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके हिसाब से बैठने की पोजीसन बनाना।

 और आखरी में पानी वाले को खोजना।

एक ही विषय पर 5 महान शायरों का नजरिया....

एक ही विषय पर 5 महान शायरों का नजरिया....

.
1- Mirza Ghalib :

"शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर,
या वो जगह बता जहाँ ख़ुदा नहीं।"
.
2- Iqbal


"मस्जिद ख़ुदा का घर है, पीने की जगह नहीं ,
काफिर के दिल में जा, वहाँ ख़ुदा नहीं।"
.
3- Ahmad Faraz


"काफिर के दिल से आया हूँ मैं ये देख कर, खुदा मौजूद है वहाँ, पर उसे पता नहीं।"
.
4- Wasi


"खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है,
तू जन्नत में जा वहाँ पीना मना नहीं।"
.
5- Saqi


"पीता हूँ ग़म-ए-दुनिया भुलाने के लिए,
जन्नत में कौन सा ग़म है इसलिए वहाँ पीने में मजा नही।"




मालदा प0 बंगाल में 2.5लाख मुस्लिमो की भीड़ द्वारा हिंसा और दहशत का नंगा नाच करने पर देश को सचेत करती ताज़ा कविता

मालदा प0 बंगाल में 2.5लाख मुस्लिमो की भीड़ द्वारा हिंसा और दहशत का नंगा नाच करने पर देश को सचेत करती  ताज़ा कविता

रचनाकार-कवि गौरव चौहान इटावा उ प्र 


ऐ भाई!तू भारत माँ के सीने की घबराहट सुन,
सोमनाथ पर हावी होती गजनबियों की आहट सुन,



नारा ए तकबीर लगाती भीड़ देख लो लाखों की,
जिन आँखों में राम कृष्ण हैं,खैर नही उन आँखों की,



पहले पढ़ी नमाज़ बाद में आगजनी-बम-गोली थी,
लगता है पूरी की पूरी तालिबान की टोली थी,



ये भारत के मुसलमान हैं,या गुंडे अफगानी हैं
इनके आगे संविधान,कानून सभी बेमानी हैं,



माना ये गुस्सा हो बैठे,उस बयान कमलेशी पर,
बंद हुआ वो आज जेल में,खड़ा हुआ है पेशी पर,



सजा अदालत देगी,ये भी छोड़ें आज अदालत पर,
रखो शरीयत घर में,ऐसे उतरें नही बगावत पर,



लेकिन ये तो टोपी जालीदार पहनकर कूद गए,
अमन शांति भाईचारे पर अपनी आँखे मूँद गए,



दरवाज़ों पर ॐ लिखा ,तो वही घराना फूंक दिया,
इतने थे बेख़ौफ़ मियां जी,पूरा थाना फूंक दिया,



सिर्फ निशाना हिन्दू ही क्यों,चुन चुन कर के पीटे थे,
और मुसाफिर बस के नीचे कॉलर पकड़ घसीटे थे,



फौजी वाहन से भी नफरत?क्यों कर आग लगाई थी?
पूरी भीड़ अचानक कैसे एक साथ बौराई थी,



अगर वजह कमलेश रहा है,सारे हिन्दू दोषी क्यों?
तो फिर अफजल भटकल दाऊद पर छायी ख़ामोशी क्यों?



क्या हम भी ये चेहरे लेकर इनके घर पर टूट पढ़ें?
और एक गुजरात बना दें,भगवा लेकर छूट पढ़ें?



ये गौरव चौहान कहे,हम तो बस प्रेम पुजारी हैं 
हैं कलाम के दीवाने हम,सबसे रखते यारी हैं,



लेकिन भीड़ मालदा वाली तो कुछ और बताती है,
तैमूरी फितरत या औरंगजेबी दौर बताती है,



आईएस सरीखे लगता ये जिहाद में डूबे हैं,
और शरीयत लागू करना,इन सबके मंसूबे हैं,



भीड़ नही ये धमकी समझो संविधान के सीने पर,
प्रश्न चिन्ह है राम राम कहने वालों के जीने पर,



जिन्हें सिर्फ असहिष्णु लगी थी भीड़ दादरी वाली जी,
आज मालदा पर चुप हैं,अब कहाँ गए हड़ताली जी,



पुरस्कार वापस करने वाले किस बिल में समा गए,
आमिर शारुख अपने मुँह में दही अचानक जमा गए,



हमने कपड़ें सौंप दिए हैं,पेशावर के दर्ज़ी को,
भूल हुयी जो दुर्गा समझा इस ममता बैनर्जी को,



अगर सनातन बटाँ रहा यूँ इन्ही सियासी मुखड़ों में,
तिलक मिटेगा और जनेऊ कटा मिलेगा टुकड़ों में,



जागो,वर्ना राम न होंगे,तुलसी के अरमानो में,
काफिर बनकर पड़े रहोगे,बाबर के तहखानों में,

------कवि गौरव चौहान